





आसोज नवरात्रा महोत्सव भावभरा आमंत्रण पत्रिका




छाजेड़ वंश का इतिहास
तेरहवी शताब्दी में कन्नौज पर राठौड़ों का शासन था । मारवाड़ क्षेत्र के पाली नगर में तत्समय पालीवाल ब्राहमनो की बहुलता थी। समृद्धि की पर्याय कौम पालीवाल आतताईयों एवं लुटेरो से त्रस्त थी तथा दुखी होकर पालीवाल ब्राह्मणों ने कन्नौज के राठोड़ों से रक्षा की गुहार की तब कन्नौज नरेश राव क्षेतराम जी के ज्येष्ठा पुत्र राय सियाजी ने पाली आकर पालीवाल ब्राह्मणों की सुरक्षा की। राव सियाजी ने मारवाड़ के बड़े भू -भाग पर राज्य किया । राव सिवाजी के पुत्र राव आस्थान जी के पुत्र रामसिंह ने बाड़मेर जिले के खेड़नगर (प्नाचीन नाम – क्षीरपुर) में राज्य किया । उनके शासन में खेड़ के नगर सेठ सोमाशाह बरड़िया थे, जिनका सिद्धपुर पाटण में कारोबार था। सेठ सोमाशाह की कुल देवी श्री भुवालमाताजी में अगाध श्रद्धा थी। उस समय खेडनगर एवं सिद्धपुर पाटण में श्री भुवाल माताजी के भव्य मंदिर थे। पाटण शहर में भी यशस्वी सेठ सोमाशाह को नगर सेठ की उपाधि से नवाजा गया था। पाटण के शासक के अनुरोध पर नगरसेठ सोमाशाह ने उनकी ज्येष्ठ पुत्री का सम्बन्ध खेड़ नरेश राव रामसिह जी से करवाया। पाटण नरेश की दूसरी पुत्री का जैसलमेर नरेश से, तीसरी पुत्री का विवाह मेवाड़ के नरेश से तथा चौथी पुत्री का भुज नरेश से सम्बन्ध किया हुआ था। चारों पुत्रियों का विवाह एक ही समय करने पर चारों नरेशों की बाराते पाटण आई। पाटण नरेश की ज्येष्ठ पुत्री का विवाह खेड़ नरेश राव रामसिंह जी से किये जाने के कारण तत्समय प्रवृत्त प्रथा के अनुसार त्याग की प्रथम रस्म रामसिंह जी को अदा करनी थी लेकिन उस समय की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण राव रामसिंह अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप त्याग की रस्म निभाने में अर्थाभाव के कारण असमर्थ थे। इस कारण राव रामसिंह जी ने पाटण स्थित श्री भुवाल माताजी के मंदिर में रात्रि में जाकर देवी के अपनी करुण पुकार की तथा देवी से अपने कुल मर्यादा की रक्षा की प्रार्थना की। राव रामसिंह ने देवी के समक्ष यह संकल्प भी व्यक्त किया कि दूसरे दिन त्याग की रस्म अदायगी हेतु प्रचुर मात्रा में धन की व्यवस्था नहीं कर पाया तो अपनी कुल मर्यादा कंलकित होने से पूर्व अपना शीश देवी को अर्पित कर दूंगा। अगाध श्रद्धा से अपनी भावना व्यक्त कर राव रामसिंह देवी का स्मरण करते लौट गये।
राव रामसिंह की अगाध श्रद्धा भक्ति से अभिभूत श्री भुवालमाता जी ने सेठ सोमाशाह को रात्रि में स्वप्न-दर्शन देकर व रामसिंह को द्रव्य उपलब्ध कराने का आदेश दिया। प्रातःकाल होते ही राव रामसिंह भुवाल माताजी के दर्शन हेतु मंदिर गये तब सेठ सोमाशाह ने उनसे देवी स्वप्न का वृतान्त बताकर नरेश के आवश्यकतानुसार धन स्वीकार करने का आग्रह किया। राव रामसिंह ने भुवाल माताजी की असीम कृपा से अनुग्रह मानते हुए सोमाशाह द्वारा प्रदत्त धन से प्रथानुसार त्याग की रस्म अदा कर अपनी कुल मर्यादा की रक्षा की। राव रामसिंह श्री भुवाल माताजी व सेठ सोमाशाह का उपकार मान कर रानी को लेकर खेडनगरी लोट आये। समय व्यतीत होने पर राव रामसिंह को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई उस समय राव रामसिंह को माताजी ने स्वप्न-दर्शन देकर कहा कि सेठ सोमाशाह के संतान नहीं है इसलिए तुम अपना पुत्र सेठ को गोद देकर सेठ के उपकार का सम्मान करो। उधर देवी ने सेठ सोमाशाह को दर्शन देकर कहा कि राव रामसिंह पुत्र गोद लो, उसी से तुम्हारा वंश चलेगा । दोनों ने देवी आज्ञा शिरोधार्य की । राव रामसिंह ने अपना पुत्र सेठ सोमाशाह को गोद दे दिया। जिस वक्त पुत्र लेने महल में गये, उस समय रानी कुंवर को स्नान करा कर उसकी आंखों में काजल लगा रही थी। इसलिए सेठ ने पुत्र का नाम काजल रखा। पुत्र काजल को लेकर सेठ अपने घर आये तथा पत्नी की कहा कि तुम स्नानादि कर देवी की पूजा कर पुत्र को प्राप्त करो। पूजा कर आने पर पुत्र काजल को ग्रहण करने के वक्त देवी कृपा से सेठानी के स्तनों में दूध भर आया। सेठ सेठानी ने देवी कृपा से प्राप्त पुत्र काजल को प्राप्त कर अपने को धन्य माना । काजल का विवाह जगमाल शाह श्री माल की पुत्री से सम्पन्न हुआ जिससे उन्हे चार पुत्र उद्धरण, ऐशव, माणक तथा भदो जी एवं एक पुत्री फूल कंवर की प्राप्ति हुई । काजल जी के चारों पुत्रों ने खेड़गढ़ स्थित कुलदेवी श्री भुवाल माताजी को प्रसन्न करने के लिए नवरात्रा महोत्सव कर धार्मिक अनुष्ठान किया जिससे प्रसन्न होकर माताजी ने वर मांगने का कहा तब चारों भाईयों ने माताजी से प्रार्थना की कि हम राव रामसिंह के वंशज होने से राठौड़ है तथा हमारे पिता सेठ सोमाशाह के गोद आने से बरडिया है इसलिए आप हमें नया गौत्र प्रदान करों तब माताजी ने मंदिर के तीन छज्जे बनवाने के निर्देश देकर कहा कि आगे से तुम्हारा गौत्र छाजेड़ प्रसिद्ध होगा ।
इस प्रकार कुलदेवी श्री भुवाल माताजी की अनुकम्पा से राठौड़ राव रामसिंह के पुत्र काजल की सन्तानों को छाजेड़ गौत्र की प्राप्ति हुई तथा राव काजल की हजारों संताने हम छाजेड़ गौत्र प्राप्त कर कुलदेवी की कृपा से गौरवान्वित है पुत्र काजल की हजारो संताने हम छाजेड गोत्र प्राप्त कर कुलदेवी की कृपा से गौरवान्वित है! छाजेडो के इतिहास का उक्त वृतांत छाजेडो की राव परंपरा के प्रतिनिधियों के द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी बताया जाता है! श्री अगरचन्द जी नाहटा एवं श्री भंवरलाल जी नाहटा निवासी बीकानेर ने जैन धर्म के ‘खतरगच्छ’ के गोत्र पर अपनी शोध के आधार लिखे ग्रन्थ में ओसवाल वंश के 1444 गोत्रों में से एक छाजेड़ गोत्र की उत्पति कुछ भिन्न प्रकार से इस प्रकार बताई है। वि.स. 1215 में आचार्य श्री जिनचन्द्रसूरि जी महाराज सवीयाणा गढ़ (सिवाना, जिला बाड़मेर) पधारे । वहा राव काजल ने गुरूदेव से रसायन से स्वर्ण सिद्धि प्रयोग की सत्यता से सम्बन्ध में जिज्ञासा प्रकट की तो गुरुदेव ने फरमाया कि हम साधु साध्वी सावध क्रिया त्यागी है अतः धर्म क्रिया के अतिरिक्त आचरण हमारे लिए वर्जित हैं तब राव काजल ने अनुरोध किया कि एक बार मुझे बताईये, इससे धर्म वृद्धि ही होगी । इस पर गुरुदेव ने कहा कि यदि तुम जैन धर्म स्वीकार करो तो मैं प्रयोग सिखा सकता हूँ । राव काजल जैन श्रावक बन गए। आचार्य श्री जिनचन्द्रसूरि ने दीपावली की रात्रि को राव काजल को अभिमंत्रित वासक्षेप देकर कहा इसे जहा डालोगे वहीं स्वर्ण बन जायेगा तथा आज रात्रि तक ही यह वासक्षेप प्रभावी रहेगा। राव काजल ने अभिमंत्रित वासक्षेप जिन मन्दिर, देवी मंदिर एवं अपने घर के छज्जों पर डाल दिया और सो गया । प्रात काल वासक्षेप डाले छज्जों को स्वर्ण का हुआ देखकर राव काजल अत्यनत आनन्दित एवं प्रभावित हुआ । तथा आचार्य भगवंत से प्रतिबोध पाकर काजल ने सम्यकत्व मूल श्रावक के बारहव्रत अंगीकार किये । गुरूदेव ने राव काजल को छाजेड़ गौत्र प्रदान किया। तभी से राव काजल की संताने छाजेड़ गौत्रीय ओसवाल कहलाने लगी है ।इस प्रकार छाजेड़ गौत्र की उत्पति में उक्त दोनों धारणाओं में भेद होते हुए ही यह निश्चयात्मक तथ्य है कि खेड़नरेश राव रामसिंह के वंशज राव काजल की संताने हम छाजेड़ परिवार सम्पूर्ण भारत में ओसवाल वंश की विशालतम शाखा के रूप में फैले हुए है। दैवीय कृपा से प्राप्त कुल की संताने अपनी समृद्ध विरासत लिए गौरव के साथ खड़ी है। सभी छाजेड़ बन्धुओं से अखिल भारतीय छाजेड़ परिवार मंडल के रूप में संगठित होकर परस्पर मातृ-भाव का विकास करते हुए श्री भुवाल माताजी की कृपा से प्राप्त समृद्ध विरासत को अक्षुण्ण रखने का आह्वान है।
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